Josh Malihabadi Biography in Hindi | उर्दू शायर जोश मलीहाबादी की जीवनी

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Josh Malihabadi Biography in Hindi
Josh Malihabadi Biography in Hindi

प्रसिद्ध उर्दू शायर “जोश” मलीहाबादी (Josh Malihabadi) को उनकी क्रांतिकारी नज्मो के कारण अंग्रेजो के जमाने में “शायरे इन्कलाब” की उपाधि दी गयी थी और लोग उन्हें पढ़ते हुए जेल चले जाते थे | उनमे अभिव्यक्ति की अद्भुद क्षमता थी | वे शब्दों में आग भर सकते थे और दिलो को दहका सकते थे | बाद  में  पाकिस्तान चले जाने के कारण उनका विरोध भी बहुत हुआ लेकिन उनकी शायरी कभी भुलाई न जा सकेगी |

जोश (Josh Malihabadi) एक ऊँचे घराने में पैदा हुए थे | वे बड़े नफासतपसंद लेकिन साथ ही बड़े निडर ,साहसी और भावुक थे | जिन मुशायरो में मुल्ला लोगो की संख्या अधिक होती , उसमे वे चुन-चुनकर ऐसी नज्मे पढ़ते थे जिनमे उन्हें फटकारा गया हो | सरकारी लोगो की महफिल होती तो अपनी मशहूर नज्म “मातमे आजादी” पढने लगते और स्त्रियों की संख्या अधिक होती तो “हाय जवानी हाय जवानी” गाने लगते | मुल्ला लोग नाक-भौ सिकोड़ते ,दफ्तरों के बाबू चेमे गोइयाँ करते और स्त्रियाँ वाक आउट कर जाती लेकिन जोश टस से मस नही होते |

भारी भरकम देह और रोबीले व्यक्तित्व के मालिक “जोश” मलीहाबादी (Josh Malihabadi) अक्से मिलने वालो पर व्यंग्य करते और उन्हें फटकारते सुनाई देते थे | वे कोई गलत शब्द या वाक्य सुनने को तैयार नही होते थे | पूरा नाम शब्बीर हसन खां , तखल्लुस “जोश” था | 5 दिसम्बर 1894 को आमो के प्रसिद्ध कस्बे मलीहाबाद (जिला लखनऊ) के एक जागीरदार घराने में उनका जन्म हुआ था | बचपन से ही बहुत बदमिजाज थे | बच्चो को छड़ी से अनाप-शनाप पीटने में बहुत मजा आता था |

युवा होने पर वे धार्मिक ढकोसलो के खिलाफ हो गये | देश में आजादी का आन्दोलन जोरो से उठ रहा था | वे भी उसके साथ हो गये और जबर्दस्त विद्रोही नज्मे लिखने लगे | उनकी किताबे चोरी छिपे लाखो की संख्या में बंटने और पढ़ी जाने लगी | कहा जा सकता है कि उन्होंने उर्दू रोमासंवादी शायरी में के नये किस्म की लडाकू शायरी की नींव डाली | रोजी रोटी के लिए जोश शाहब (Josh Malihabadi) कुछ साल हैदराबाद भी रहे लेकिन वहा भी उनकी बन नही सकी | वे दिल्ली चले गये और “कलीम’ नामक मासिक पत्रिका निकालने लगे |

आजादी मिलने के बाद नेहरु जी ने उन्हें “आजकल” मासिक के उर्दू संस्करण का सम्पादक बना दिया लेकिन 1955 में कुछ पाकिस्तानी नेताओं के लालच में आकर वे कराची चले गये लेकिन वहा वे खुश नही रहे | उनसे जो वादे किये गये थे वे पुरे नही हुए और लोगो ने भी उनकी बड़ी लानत-मलालत की | भारत में उनका विरोध होने ही लगा था | 1967 में उनकी नौकरी खखत्म कर दी गयी और 1983 के अपने अंतिम दिनों तक निराशा और गुमनामी में इस्लामाबाद में रहते रहे | अपनी आत्मकथा “यादो की बरात” में उन्होंने इन सब बातो का वर्णन किया है | इसमें उन्होंने हिन्दुस्तान और यहा के नेताओं की तारीफ़ की थी इसलिए पाकिस्तान में यह किताब जब्त कर ली गयी उनके एक दर्जन के करीब कविता संग्रह प्रकाशित हुए है

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