शूरवीर महाराणा प्रताप की जीवनी | Maharana Pratap Biography in Hindi

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Maharana Pratap Biography in Hindi
Maharana Pratap Biography in Hindi

महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) का जन्म स्थान राजस्थान के कुम्भलगढ़ में हुआ | उनके पिता महाराणा उदयसिंह और माता रानी जीनत कंवर थी | उदयसिंह ने ही बाद में उदयपुर नगर बसाया तथा महल एवं किले का निर्माण करवाया | मेवाड़ तक उनके राज्य की सीमा थी जिसमे कई दुर्ग थे | सबसे प्रसिद्ध दुर्ग था चित्तोड़ | पहले यही मेवाड़ की राजधानी था बाद में उदयपुर राजधानी बनी | प्रताप (Maharana Pratap) राणा सांगा के वीर पौत्र थे | 17 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ तथा 16 मार्च 1559 को पुत्र अमरसिंह का जन्म हुआ |

अकबर ने जब चित्तोड़ पर आक्रमण किया तो उदयसिंह सैनिको के साथ लड़े परन्तु हारने लगे तो राणा प्रताप को लेकर पहाडियों में भागकर शरण ली | स्त्रियों ने जौहर दिखाया तथा जवानो ने मृत्यु आने तक दुर्ग के द्वार पर युद्ध किया | सैकड़ो सैनिक मारे गये , मन्दिरों को तोडा गया | राणा प्रताप ने यह सब देखा और हार का बदला लेने का संकल्प लिया | राणा प्रताप (Maharana Pratap) का राज्याभिषेक जब हुआ तब उसके राज्य का बहुत सा हिस्सा अकबर के अधिकार में था |

1582 में प्रथम बार उन्होंने देवीर में मुगल सेना को हराया तथा आगे के लिए आक्रमणत्मक रवैया अपनाया | अकबर को लगता था महाराणा प्रताप समर्पण कर देंगे पर वे अत्यंत वीर , तेजस्वी तथा दृढ़संकल्प वाले थे | वे निरंतर युद्ध के लिए तत्पर रहते थे | मातृभूमि तथा धर्म की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते थे | एक के बाद एक युद्ध अकबर ने छेड़े पर प्रताप को न पकड़ सका | अन्य बहुत से राजपूत राजाओं ने अकबर के सामने समर्पण कर दिया पर प्रताप झुकने को तैयार नही हुए |

पहले मानसिंह फिर भगवानदास और फिर टोडरमल को भेजकर अकबर ने उसे अपने अधीन करना चाहा पर प्रताप बिल्कुल दृढ़ थे | धीरे धीरे अपनी शक्ति बढाते रहे और अंत में हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध 1576 में लड़ा | प्रताप के 22,000 सैनिक शाही सेना का मुकाबला करने लगे | बहुत भयंकर युद्ध हुआ | विश्वासपात्र भील भी प्रताप का साथ दे रहे थे | जिस स्थान पर युद्ध हुआ वहा पर्वत-वन तथा नदियाँ थी | चेतक घोड़े पर सवार प्रताप (Maharana Pratap) शत्रुओ के बीच वीरता से लड़ते रहे |

राजपूत सैनिको में से चौदह हजार मारे गये | आठ हजार किसी तरह जान बचाकर निकल पाए | कोई चारा न देखकर प्रताप चेतक पर सवार होकर निकल पड़े | पीछे मुगल सैनिक थे | दौड़ते दौड़ते चेतक गिरकर मर गया | प्रताप ने प्रिय घोड़े को श्रुधान्जली दी | इस युद्ध में बहुत से वफादार सरदारों ने प्रताप के लिए धन-बल अर्पित किया | महाराणा प्रताप चित्तोड़ छोडकर वनवासी हो गये | उनकी प्रतिज्ञा थी जब तक चित्तोड़ को जीत नही लूँगा भूमि पर शयन करूंगा तथा वन में निवास |

पत्नी और बच्चो के साथ वन वन भटकते वीर ने बहुत बार घास की रोटी खाकर गुजारा किया पर अकबर की अधीनता नही मानी | हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप की युद्धनिति छापामार लड़ाई ही रही थी | जब अकबर अन्य कामो में लगा था तब प्रताप ने बहुत से स्थानों पर अधिकार कर लिया था परन्तु चित्तोड़ को न जीत पाने का मलाल उन्हें खाता रहा | अंत में 1597 में उनकी मृत्यु हुयी | उनके वफादार साथियो ने प्रतिज्ञा की कि वे अकबर की अधीनता स्वीकार नही करेंगे |

उपलब्धिया

  • प्रताप (Maharana Pratap) अत्यंत स्वाभिमानी योद्धा थे जिन्होंने बाह्य आक्रमणकारियों के सामने कभी घुटने नही टेके |
  • आक्रमणकारियों के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े रहने वाले भारतीय क्रातिकारी थे |
  • उनकी दृढ़ता तथा देशभक्ति की प्रशंशा शत्रु भी करते थे |
  • हल्दीघाटी का कण-कण रक्तरंजित हो गया पर प्रताप हारे नही |
  • अनेक लोककथाओं , लोकगीतों के नायक रहे थे महाराणा प्रताप |
  • साहित्यकारों , कवियों , लेखको ने उनकी वीरता को अपने ग्रंथो में वर्णित किया है |
  • उनके तथा प्रिय चेतक घोड़े के अनेक स्मारक देश में हर कही बनाये गये है |
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