डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र रॉय की जीवनी | Prafulla Chandra Ray Biography in Hindi

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डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र रॉय की जीवनी | Prafulla Chandra Ray Biography in Hindi
डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र रॉय की जीवनी | Prafulla Chandra Ray Biography in Hindi

भारत के प्रसिद्ध रसायनज्ञ डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र रॉय (Prafulla Chandra Ray) का जन्म 2 अगस्त 1861 को बांग्लादेश के रदौली गाँव में समृद्ध जमींदार हरिश्चन्द्र रॉय के घर हुआ था | रदौली गाँव उस समय भारत के प्रसिद्ध ग्रामो में से था | बांगला के महाकवि मधुसुदन दत्त और प्रसिद्ध नाटककार दीन बन्धु इसी ग्राम के निवासी थे | प्रफुल्ल चन्द्र के पिता पाश्चात्य शिक्षा के प्रति आकर्षित थे | उन्होंने अपने गाँव में प्राथमिक विद्यालय स्थापित किया था जहा प्रफुल्ल चन्द्र राय की प्राथमिक शिक्षा हुयी |

प्रफुल्ल चन्द्र राय (Prafulla Chandra Ray) 9 वर्ष की उम्र में कलकत्ता के हेयर स्कूल में प्रविष्ट कराए गये , जहा से उन्होंने 1879 में दसवी की परीक्षा उत्तीर्ण की | गर्वीले छात्रों से प्रफुल्ल सर्वथा दूर रहते थे | उनकी पढने-लिखने में रूचि थी | अपने पिता के पुस्तकालय में प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के जीवन चरित्र के संग्रह को पढकर प्रफुल्ल बड़े प्रभावित हुए | उन्हें अंग्रेजी पुस्कते विशेषतया अंग्रेजी नाटक पढने का भी शौक था | उनके पिता ब्रह्मसमाजी विचारों के थे | एक बार अचानक प्रफुल्ल बीमार हो गये और सात मास तक बीमारी की दशा में भी वह पुस्तके पढाते रहे |

एम.ए. में प्रफुल्ल (Prafulla Chandra Ray) ने रसायन विज्ञान में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट में प्रवेश लिया | कालान्तर में इस इंस्टिट्यूट का नाम विद्यासागर कॉलेज रखा गया | अपनी कक्षा के अतिरिक्त प्रफुल्ल भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र के व्याख्यान सुनने के लिए प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी जाया करते थे | उन्होंने अपने छात्रावास के कमरे में ही एक छोटी सी प्रयोगशाळा बना ली थी | विज्ञान के साथ साथ वह संस्कृत भाषा का ज्ञान भी अर्जित करते रहे थे |

अपने मित्रो और अभिभावकों आदि को बिना बताये प्रफुल्ल ने अखिल भारतीय गिलक्राइस्ट स्कॉलरशिप प्रतियोगिता की तैयारी की और उसने उत्तीर्ण हुए | इससे प्रफुल्ल को उच्च शिक्षा इ लिए यूरोप जाने का अवसर मिला | इस प्रकार सन 1882 में प्रफ्फुल इंग्लैंड के एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय में प्रविष्ट हो गये | जहा वे प्रसिद्ध रसायन वैज्ञानिक अलेक्सेंडर क्रम ब्राउन के प्रभाव में आये और रसायनशास्त्र के प्रति उनका प्रेम बढ़ता गया | प्रफुल्ल ने जर्मन भाषा सीखी और रसायनशास्त्र की जर्मन पुस्तको का भी अध्ययन किया |

सन 1885 में एडिनबर्ग विश्वविद्यालय की स्नातक कक्षा के छात्र के रूप में प्रफुल्ल ने विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक निबन्ध प्रतियोगिता में भाग लिया | निबन्ध का विषय था “गदर से पहले और बाद का भारत” | इस प्रतियोगिता में उन्हें कोई पुरुस्कार नही मिला | उसका कारण यह था कि गदर के बाद भारत की दयनीय दशा के लिए वे ब्रिटिश सरकार को उत्तरदायी मानते थे और यही सब कुछ उन्होंने निबन्ध में भी लिखा था जबकि उस समय भारत में अंग्रेज ही शासन कर रहे थे | तदपि उनकी भाषा और शैली की सबने प्रसंशा की | कालान्तर में यह लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ और उसके माध्यम से इंग्लैंडवासियों को भारत की दुर्दशा का ज्ञान हो गया |

सन 1893 में प्रफूल ने “म्र्क्युर्स नाइट्रेट” नाम अस्थायी पदार्थ अपनी प्रयोगशाळा में तैयार करके दिखाया था | प्रफुल्ल ने बी.एस.सी. करने के उपरान्त “कच्ची धातु के विश्लेष्ण” विषय पर शोध कार्य आरम्भ किया और फिर “अकार्बनिक रसायन” विषय पर 1888 में एडिनबैरो विश्वविद्यालय से डी.एस,सी. की उपाधि अर्जित कर ली | 1889 में भारत लौटने पर उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता में सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त कर लिया गया और सन 1911 में वे उसी कॉलेज के वरिष्ट प्रोफेसर बनाये गये | अध्यापन कार्य के अतिरिक्त उन्होंने स्वयं को बड़े उत्साह के साथ मौलिक शोधकार्य में भी समर्पित कर दिया |

सन 1916 में वे कॉलेज के कार्य से सेवानिवृत हुए तथा महान शिक्षाशास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी के निवेदन पर नवसृजित विश्वविद्यालय के विज्ञान महाविद्यालय में रसायनशास्त्र के पालित प्रोफेसर पद पर प्रतिष्टित हुए | उन्होंने अपने घर पर सन `1900 में एक कारखाना स्थापित किया जो कालान्तर में धीरे धीरे लाभकारी सिद्ध हुआ और वहां का बहुत बड़ा कारखाना माना जाने लगा था | उस कारखाने का नाम था “बंगाल केमिकल्स एन्ड फार्मास्यूटिकल वर्क्स” | वह आज प्रसिद्धि के शिखर पर है | इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अन्य अनेक कारखाने स्थापित करवाए |

मेर्क्युर्स नाइट्रेट के अलावा डा.रॉय ने अमोनिया नाइट्रेट यौगिको तथा उनके व्युत्पादों पर मौलिक अनुसन्धान किये जिसके कारण वे विश्वविद्यालय के रसायनशास्त्रियों की प्रशंशा का पात्र बने | नाइट्रोजन अम्ल और लवण के बारे में उनके अनुसन्धान की काफी प्रसंशा हुयी | अनेक वर्षो के अध्ययन के पश्चात उनकी प्रसिद्ध पुस्तक The History of Indian Hindu Chemistry सन 1902 में  प्रकाशित हुयी | उस पुस्तक की पर्याप्त सराहना वैज्ञानिकों के मध्य हुयी थी | उसका दूसरा खंड भी सन 1908 में प्रकाशित हो गया | 1912 के भयानक दुर्भिक्ष में वे सब शोधकार्य छोडकर पीडितो की सहायता के लिए कूद पड़े थे | इसी प्रकार सन 1931 में उत्तरी और पृवी बंगाल में पुन: बाढ़ का प्रकोप आने पर संकट निवारण समिति का नेतृत्व किया |

सन 1911 में उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा नाईट की उपाधि से विभूषित किया गया | सन 1934 में वे लन्दन रॉयल सोसाइटी के सम्मानित सदस्य चुने गये | वे भारतीय रसायन सोसायटी के दो वर्ष तक संस्थापक सदस्यों में रहे थे | 1936 में पालित प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत होते हुए जीवन पर्यन्त एमेरिटस प्रोफेसर बनकर रहे | 1921 में 60 वर्ष की आयु के होने पर उन्होंने अपने मासिक वेतन का स्वैच्छिक दान का निवेदन किया | यह राशि विश्वविद्यालय विज्ञान और तकनीकी महाविद्यालय के विकास के लिए निर्धारित की गयी | इसके साथ ही अन्याय पुरुस्कारों की भी स्थापना की | सन 1932 में उन्होंने अपनी आत्मकथा पुरी की | 24 जून 1944 को सांयकाल 6 बजकर 20 मिनट पर ह्रुद्यगति रुकने से सहसा उनका निधन हो गया | उस समय वे कलकत्ता विश्वविद्यालय और तकनीकी कॉलेज में ही थे | विगत 30 वर्षो से यही उनका घर था |

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