रानी दुर्गावती की जीवनी | Rani Durgavati Biography in Hindi

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रानी दुर्गावती की जीवनी | Rani Durgavati Biography in Hindi
रानी दुर्गावती की जीवनी | Rani Durgavati Biography in Hindi

अनन्य देशभक्त , वीर हृदया रानी दुर्गावती (Rani Durgavati) का जन्म उत्तर प्रदेश के महोबा में हुआ था | उनके पिता चन्देल कीरतसिंह महोबा के राजा थे | दुर्गावती बहुत सुंदर तथा गुणवती थी | उनके पिता ने उन्हें पढाने के लिए एक पंडित नियुक्त किया | दुर्गावती ने पंडित जी से साफ़ शब्दों में कहा “मुझे क-ख-ग मत पढाओ , मुझे महाभारत के युद्ध की कहानिया तथा रामायण एवं लंकाकाण्ड की कहानियाँ सुनाओ” | दुर्गावती पढाई में ध्यान नही देती थी बल्कि पढाई छोडकर धनुष-बाण , तलवार , घुडसवारी आदि का अभ्यास करती थी | पंडित जी राजा कीरतसिंह के भय के कारण उसे कुछ कहते नही थे | कीरतसिंह समझते थे कि पुत्री पढ़ रही है |

दुर्गावती (Rani Durgavati) ज्यो ज्यो बड़ी होती गयी , त्यों त्यों धनुष बाण , तलवार विद्या तथा घुडसवारी में माहिर होती चली गयी | वे हाथी की सवारी भी करती थी | एक बार एक हाथी पर वे बैठी थी | तभी हाथी बिगड़ गया किन्तु दुर्गावती ने उसे अपने काबू में कर लिया | महावत भी आश्चर्यचकित होकर रह गया | दुर्गावती जब विवाह योग्य हुयी तो उनके पिता को विवाह की चिंता होने लगी परन्तु वे अपनी पुत्री का विवाह किसी ऐसे शुरवीर से करना चाहते थे जो उन्हें अपनी शुरवीरता का चमत्कार दिखाए |

इसी बीच गोंडवाना के राजकुमार दलपतशाह ने कीरतसिंह को पत्र लिखकर दुर्गावती से विवाह करने का प्रस्ताव भेजा इस पर कीरतसिंह ने उत्तर भेजा कि यदि दलपतशाह महोबा की सेना को हरा दे तो उनका विवाह दुर्गावती से सहर्ष कर देंगे | कीरतसिंह का पत्र पाकर दलपतशाह महोबा पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा | इधर कीरतसिंह एक अन्य राजपुर युवक के साथ दुर्गावती के विवाह की तैयारी कर रहा था | दुर्गावती मन ही मन दलपत शाह के साथ विवाह करना चाहती थी तथा उसे अपने पिता द्वारा वर के रूप में प्रस्तावित अन्य राजपूत कुमार को पसंद नही था | अत: दुर्गावती ने दलपतशाह को पत्र लिखकर अपनी इच्छा से अवगत कराया तथा दुर्गावती के पत्र से दलपतशाह की रगों में बिजली दौड़ गयी | उसने सेना एकत्र करके महोबा पर आक्रमण कर दिया | उसके शौर्य के सामने महोबा की सेना ने घुटने टेक दिए | दलपतशाह की विजय हुयी |

कीरतसिंह ने दलपतशाह के शौर्य से मुग्ध होकर दुर्गावती (Rani Durgavati) से उसका विवाह कर दिया | एक वर्ष बाद दुर्गावती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम वीर नारायण था | जब पुत्र चार वर्ष का हुआ तब दलपतशाह की मृत्यु हो गयी | दलपतशाह की मृत्यु के बाद दुर्गावती ने बड़े साहस एवं धैर्य के साथ राज्य की बागडोर को सम्भाला | वे वीरनारायण की प्रतिनिधि के रूप में सिंहासन पर बैठकर राज्य करने लगी | उन्होंने गोंडवाना राज्य की प्रजा के लिए कई कल्याणकारी योजनाये बनाई | नई नई सड़के , खेती के लिए सिंचाई के प्रबन्धन , बाग़-बगीचे , कुए आदि का निर्माण कराया | गोंडवाना की प्रगति को देखकर आसपास के राज्यों के राजाओं को इर्ष्या हुयी | वे गोंडवाना राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे | जब दुर्गावती को इसका पता चला तो उसने एक-एक राजा को परास्त करके उसका राज्य अपने राज्य में मिला लिया | इस प्रकार रानी दुर्गावती ने अपने ही पराक्रम से गोंडवाना राज्य का विस्तार कर दिया |

गोंडवाना के विस्तार एवं वैभव की चर्चा मुगल सम्राट अकबर ने भी सूनी | वह दुर्गावती (Rani Durgavati) की सुन्दरता के बारे में पहले ही सुन चूका था अत: उसने गोंडवाना पर आक्रमण करके रानी को अपने अधीन करने की योजना बनाई परन्तु युद्ध से पूर्व उसने रानी को उपहार स्वरूप “चरखा” भेजा जिसके जवाब में रानी एक मोटा “डंडा” भेजा | एक पर अकबर क्रुद्ध हुआ तथा उसने अपने सेनापति को गोंडवाना पर आक्रमण करके रानी दुर्गावती को बंदी बनाकर दरबार में पेश करने का आदेश दिया | युद्ध आरम्भ होने से पूर्व अकबर के सेनापति ने रानी दुर्गावती को अधीनता स्वीकार कर आगरा चलने का संदेश भेजा | इस संदेश के जवाब में रानी दुर्गावती ने अकबर के सेनापति आसफ खां को संदेश भेजा कि “तुम मेरी सेना में भर्ती हो जाओ मै तुम्हे अच्छा वेतन दूंगी” |

आसफ खां इस संदेश से बौखला गया | उसने गढ़मंडल के दुर्ग पर चढाई कर दी | रानी दुर्गावती ने आसफ खा का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया परन्तु नदी में बाढ़ आ जाने से रानी की सेना बाढ़ में फंस गयी | उनके साथ उनका 18 वर्षीय पुत्र वीरनारायण भी साथ था | भयंकर युद्ध में रानी के सैनिक आहत हुए या मारे गये | वीरनारायण भी घायल हो गया | दुर्गावती ने वीरनारायण को विश्वस्त सरदारों के साथ चौरागढ़ के किले में भेज दिया | उस समय रानी के पास केवल 300 सैनिक रह गये थे परन्तु अपने अदम्य साहस के बल पर 2000 सैनिको पर तथा आसफखा पर भारी पड़ने लगे |

रानी आसफ खा की सेना पर कहर ढाने लगी तभी एक तीर उनकी आँख पर लगा तथा दूसरा तीर उनकी दुसरी आंख पर लगा | रानी ने दोनों तीर निकालकर फेंक दिए तथा दांतों से घोड़े ई लगाम पकड़कर दोनों हाथो से तलवार चलाती रही | सहसा एक तीर उनकी गर्दन पर लगा और वे घोड़े से नीचे गिर गयी तथा उन्होंने स्वयं अपनी कटार से अपने जीवन का अंत कर लिया ताकि उनके शरीर को जीते जी शत्रु न छू सके | आसफ खा ने विस्मित होकर कहा “कोई नारी इतनी शूरवीरा हो सकती है मैंने कभी सोचा तक नही था” | स्वतंत्रता के लिए लड़ते लड़ते रानी दुर्गावती (Rani Durgavati) शहीद हो गयी | उनके शौर्यपूर्ण बलिदान ने उन्हें अमर बना दिया तथा सदा के लिए स्मरणीय बना दिया |

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