Santosh Yadav Biography in Hindi | संतोष यादव की जीवनी

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Santosh Yadav Biography in Hindi

शताब्दी की चर्चित महिला संतोष यादव (Santosh Yadav) का नाम पर्वतारोहण के क्षेत्र में इसलिए अग्रणी है कि उन्होंने विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट को अपने पैरो से दो बार नापकर नया इतिहास रचा | यही नही , दुसरी बार उन्होंने चीन की तरफ से काशशुंग के कठिन मार्ग को चुना , जो बहुत चुनौती भरा कदम माना जाता है | 28 मई 1999 की सुबह नेपाली समय के अनुसार 7 बजकर 10 मिनट पर उनके अभियान दल के कुल 10 सदस्यों में से 3 ने एवरेस्ट चोटी पर पहुचकर भारतीय ध्वज तिंरगा फहराया | इन तीनो में संतोष यादव ()Santosh Yadav न केवल अकेली महिला थी पुरुष-महिला मिलाकर कुल 10 सदस्यीय अभियान दल का नेतृत्व भी वे कर रही थी |

लगभग 8848 मीटर की ऊँचाई पर जहा तापमान सामान्य से 40-50 डिग्री सेल्सियस से कम था , संतोष यादव ने अपनी चिंता छोडकर प्रसन्नता व उत्साह से भरे दिल से राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद सबसे पहले उपहार से प्राप्त अपने इरिडियम सॅटॅलाइट फोन से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाज[पेयी को विजय समाचार दिया | उत्तर में वाजपयी को विजय समाचार दिया | उत्तर में वाजपेयी जी ने संतोष यादव एवं उनके दल को बधाई देते हुए कहा “देश आपकी इस उपलब्धि पर गर्व करेगा” |

अभियान में सहयोग करने वाले अपने साथियों ,सहयोगियों और देशवासियों को भी संतोष यादव ने संदेश भेजे कि दुस्वप्न की तरह बहुत खराब मौसम के दो दिन झेलने के बाद अब सब ठीक है और हम उपलब्धि हासिल कर चुके है | गर्व के इस क्षण को मै आप सबके साथ बांटना चाहती हु और सबके प्रति आभार व्यक्त करती हु और फिर पर्यावरण प्रेमी संतोष यादव ने कई दलों द्वारा चोटी पर छोड़े गये लगभग 500 किलोग्राम कचरे में समेटा और अपने दल की सहायता से उसे नीचे तक ढोकर लाई | यह कोई आसान काम न था पर इस पर कई बार अपनी चिंता व्यक्त कर चुकी सुश्री यादव को यह गवारा नही हुआ कि उसे वहा छोड़ आती | कम से कम उनके अभियान के समय एक बार तो चोटी पर सफाई हो ही गयी , जिसका श्रेय न लेकर वह समाचार पत्रों के माध्यम से संबधित संस्थाओं और पर्वतारोहियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करती रही |

संतोष यादव ()Santosh Yadav का जन्म दक्षिण पश्चिम दिल्ली के एक गाँव जेनियावास में हुआ था | पांच भाइयो सहित उसके परिवार को शीघ्र ही आभास हो गया था कि यह लड़की सामान्य से कुछ हटकर है | माँ-बाप के दिए नाम संतोष को नकारते हुए बालिका संतोष अपनी स्थिति से संतुष्ट न थी | सामान्य ग्रामीण लडकियों की तरह ही माता-पिता उसे गाँव के स्कूल में जरूरत भर की शिक्षा दिलाकर उसकी शादी कर देना चाहते थे | पर संतोष सामान्य लडकी न थी | भाइयो की देखी देखी वह भी लडको के खेल खेलने में रूचि लेती थी | फ़्रोक पहनने की बजाय नेकर टीशर्ट पहनना पसंद करती थी |

उसके धनी व्यापारी पिता उसे किसी अच्छे पब्लिक स्कूल में पढाने की सामर्थ्य रखते थे पर उसे पढने के लिए घर से दूर शहर भेजने के लिए तैयार न थे | गाँव में ही शिक्षा दिलवाकर आम लडकियों की तरह पन्द्रह सोलह उम्र में उसकी शादी कर देना चाहते थे | पर संतोष ने विद्रोह का हथियार उठा लिया | उसने घोषणा कर दी कि अपनी पसंद की पुरी शिक्षा लिए बिना वह विवाह हरगिज नही करेगी और इसके साथ ही उसने घर छोड़ दिया | समीप ही शहर दिल्ली में एक अच्छे स्कूल में दाखिला ले लिया और घर से कोई मदद लिए बिना अपने पढाई खर्च के लिए अंशकालिक रोजगार खोजने लगी | उसके इस कदम पर पिता झुके और उसे उसकी पसंद की शिक्षा दिलाने को राजी हो गये |

पर संतोष यादव ()Santosh Yadav के अपनी प्रगति के लिए किये गये प्रयत्न को यही विराम नही लगा | वह पर्वतारोहण का सपना देखते हुए पास की पहाडियों पर चढने और इस तरह के स्केच बनाने में रूचि लेने लगी | जयपुर यात्रा के बाद उनके चित्रों में जयपुर के निकट की अरावली पहाडियों की और उनके आस-पास रहने वाले लोगो की छवियाँ उतरने लगी | इसी यात्रा में एक संयोग बना | उनकी भेंट एक पर्वतारोही छात्र दल से हुयी तो उन्होंने दल के नेता से पूछा “क्या लडकियाँ भी पर्वतारोहण कर सकती है ?” और उत्तर “हाँ क्यों नही ” मिलने पर वह उत्साह से भर उठी | इसी प्रेरणा से अभिभूत होकर उन्होंने पर्वतारोहण के एक स्थानीय स्कूल में दाखिला ले लिया | कुछ दिनों बाद उनके साथ कुछ सहेलिया भी आ मिली और संतोष का पर्वतारोहण का सपना एक शौक , के हॉबी से बढकर एक करियर तक की यात्रा करने लगा |

माता-पिता के लिए संतोष का यह स्वतंत्र निर्णय एक सदमे से कम न था | जब तक पिता को पता चला तब तक वह अपने इस शौक के लिए सारी बचत राशि कर “उत्तरकाशी नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनियरिंग” में प्रवेश ले चुकी थी | गुस्से से भरे पिता ने बेटी की पढाई छुड़ाकर उसे घर वापस ले आने के मन बना लिया | पर तभी वे सीढ़ी से गिरकर अपने पैर की हड्डी तुडवा बैठे और संतोष को अपनी मनचाही दिशा में आगे बढने का मौका मिल गया | अगले वर्ष उन्होंने पर्वतारोहण में अगला कोर्स भी कर लिया और कक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सबका मन जीत लिया | जहा चाह वहा राह | आगे बढ़ते कदमो को कब कौन रोक पाया है ? साहस की विजय होनी थी सो हुयी | संतोष यादव का संकल्प रंग लाया | वह पर्वतारोही बन गयी |

प्रतिवर्ष पर्वतारोहण के अभ्यास से अब संतोष जी ने पर्याप्त योग्यता और शारीरिक क्षमता हासिल कर ली थी | छोटे अभियानों के बाद उनका एवेरेस्ट विजय का सपना सामने था जिसे साकार करने में वह जुट गयी और जल्द ही उसमे सफल भी हो गयी | एवेरेस्ट विजय करने वाली सर्वाधिक कम उम्र की महिला होने के नाते उन्होंने सारे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा और लोकप्रियता हासिल की | इससे अगले ही वर्ष उन्होंने दुसरे अभियान की तैयारी कर ली थी | इस बाद दल की नेत्री के रूप में 19 मार्च 1999 को प्रधानमंत्री के हाथो राष्ट्रीय ध्वज लेकर वे अपने 10 सदस्यीय दल के साथ अभियान के लिए निकल पड़ी |

मार्ग की अनेक बाधाओं को पार करती , खतरों का सामना करती अंततः चोटी से निचले बेस तक पुरे दल के साथ और चोटी पर तीन सदस्यों के साथ 28 मई 1999 को उन्होंने प्रधानमंत्री को अपनी विजय का समाचार भेज दिया | यह उनकी भारी सफलता थी | इसके बाद देश-विदेश के लगभग सभी समाचार पत्रों में उन्हें “पहली महिला” के नाते  इस रूप में याद किया |

पर्वतारोहण के रिकॉर्ड बनाने के बाद संतोष यादव (Santosh Yadav) सिविल सर्विस की परीक्षा में सफल होकर दिल्ली में पुलिस अधिकारी बन गयी थी | अपने इन सभी रूपों में उन्होंने अपार ख्याति एवं लोकप्रियता अर्जित की , जिसके बाद उन्हें खेल जगत के प्रतिष्टित “अर्जुन पुरुस्कार ” और राष्ट्रीय अलंकरण “पद्मश्री” से सम्मानित किया गया | सफल पर्वतारोही और सफल पुलिस अधिकारी बनने के बाद 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने विवाह किया और एक समर्पित पत्नी एवं सफल माँ बन गयी | पुलिस सेवा में आने के बाद भी उन्हें छुट्टियों के दौरान पर्वतारोहण की छुट मिली हुयी थी | विवाह के बाद स्वेच्छा से इस छुट का मोह त्याग दिया और पुलिस अधिकारी , माँ और पत्नी की तिहरी भूमिका निभाने लगी |

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