भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की जीवनी | Sarojini Naidu Biography in Hindi

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भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की जीवनी | Sarojini Naidu Biography in Hindi
भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की जीवनी | Sarojini Naidu Biography in Hindi

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था | इनके पिता डा.अघोर नाथ चट्टोपाध्याय एक प्रसिद्ध डॉक्टर ,वैज्ञानिक एवं कई विषयों के विद्वान थे | इनकी माता का नाम वरद सुन्दरी था | वे एक धार्मिक ,सात्विक तथा साहित्यिक रूचि की महिला थी | इस प्रकार सरोजिनी नायडू में अपने माता और पिता दोनों के गुणों का समावेश था |

बचपन से ही वे कुशाग्र बुद्धि तथा स्वाभिमानी महिला थी | उनके पिता उन्हें गणितज्ञ या वैज्ञानिक बनाना चाहते थे किन्तु उनमे काव्य प्रतिभा बलवती थी | एक दिन वे बीज गणित का कोई प्रश्न हल करने की कोशिस कर रही थी | जब वह प्रश्न हल नही हुआ तो उबकर उन्होंने किताब एक ओर रख दी और अपनी कॉपी में कविता लिखना शुरू कर दिया | इस प्रकार पहली कविता उन्होंने अपनी बीजगणित की कॉपी में लिखी |

सरोजिनी (Sarojini Naidu) को अंग्रेजी एवं फ्रेंच पढाने के लिए घर [पर ही शिक्षिकाये आती थी | 12 वर्ष की आयु में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की | इसी बीच उन्होंने पर्याप्त साहित्यिक ज्ञान भी अर्जित कर लिया | 13 वर्ष की आयु में उनकी 1300 पंक्तियों की एक लम्बी कविता प्रकाशित हुयी थी जिसका नाम था The Lady of the Lake | इस कविता के रस सौन्दर्य तथा शब्द विन्यास ने सभी को चकित कर दिया | अधिक परिश्रम के कारण सरोजिनी का स्वास्थ्य खराब रहने लगा | डॉक्टरो ने आराम करने की सलाह दी | पर उन्हें चैन कहा ? डॉक्टरो को विशवास दिलाने के लिए वे एकदम स्वस्थ है उन्होंने 2000 पंक्तियों का एक पूरा नाटक लिख डाला |

इसके बाद ही उन्होंने एक फारसी नाटक “मेहन मुनीर” की रचना की | उनके पिता ने नाटक के एक प्रति हैदराबाद के निजाम को भेंट की | निजाम ने सरोजिनी की इस प्रतिभा से प्रसन्न होकर विदेश में अध्ययन करने के लिए छात्रवृति दी | इस प्रकार 16 वर्ष की आयु में उन्हें विदेश जाकर अध्ययन करने का अवसर मिला | अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान सरोजिनी को एक दक्षिण भारतीय डॉक्टर गोविन्द राजुलू नायडू से प्रेम हो गया | तीन वर्ष तक लन्दन में शिक्षा प्राप्त कर सरोजिनी भारत लौटी | उस समय वे मात्र 19 वर्ष की थी | इसके तीन माह बाद ही उन्होंने डॉक्टर गोविन्द से विवाह कर लिया | इस अंतरजातीय विवाह से एक बवंडर खड़ा हो गया परन्तु उन्हें पिता रूढ़िभंजक थे उन्होंने इस विवाह को मान्यता दी | धीरे धीरे सभी लोग शांत हो गये तथा सरोजिनी नायडू के इस साहसिक कदम की प्रशंशा होने लगी |

विवाह के पश्चात उनकी काव्य साधना जारी रही | प्रेम और प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी कविता के आलम्बन थे | इसके अतिरिक्त देहस प्रेम ,सत्य की खोज , नारी के आदर्शो , प्रेम और सौन्दर्य को अपनी काव्य अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया | वे जन्मजात कवियत्री थी |अंग्रेजी भाषा का उनमे सहज प्रवाह था | उनकी कविताओं का संग्रह The Golden Threshold (1905) , The Broken Wing (1917), The Bird of Time (1912) , The Father of Don (1920) में प्रकाशित हुए | इनमे अनेक कविताये भारतीय महाविद्यालयो के पूर्व स्नातक पाठ्यक्रमो में शामिल की गयी | महात्मा गांधी ने आपको “भारत की बुलबुल” की संज्ञा दी | उन्होंने Broken Wing नाम काव्य संग्रह में अपने खराब स्वास्थ्य की चर्चा की थी | उनकी कविता अपराजेय वे अपनी आत्मा की अमरता पर प्रकाश डाला है |

इसके बाद वे राजनीति में सक्रिय हो गयी और उनकी काव्य साधना छुट गयी | गोपालकृष्ण गोखले के आह्वान पर वे राजनीति में सक्रिय हो गयी और स्वतंत्रता संग्राम में पुरी तरह जुट गयी | महात्मा गांधी से उनकी मुलाक़ात हुयी और वे कांग्रेस में शामिल हो गयी | देश का भ्रमण किया | देशभक्ति और राष्ट्र चेतना का संदेश लेकर वे जन जन को जगाने लगी तथा जनता के समर्थन से शक्ति ग्रहण करने लगी |

1917 में उन्होंने महिला मताधिकार आन्दोलन का नेतृत्व किया | 18 महिलाओं का एक शिष्टमंडल लार्ड चेम्सफोर्ड से मिला | इसका नेतृत्व सरोजिनी नायडू ने किआ | उनकी यह मांग मान ली गयी | 1917 से 1947 तक ऐसी कोई महत्वपूर्ण घटना नही हुई जिसमे श्रीमती सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) ने आगे बढकर भाग न लिया हो | 1918 में उन्होंने जिनेवा सम्मेलन में महिला मताधिकार परिषद के सामने भारतीय महिलाओं का पक्ष बड़े प्रभावी ढंग से रखा | 1919 में मुम्बई में निषिद्ध पम्पलेट बांटकर असहयोग आन्दोलन में योगदान दिया | इसी वर्ष जलियांवाला बाग़ स्व वे इतनी विचलित हो गयी कि अंग्रेज सरकार की निंदा खुले आम करने लगी | 7 जुलाई को उन्होंने होमरूल लीग के प्रतिनिधि मंडल का सदस्य बनाकर लन्दन भेजा गया | वहां उनकी अनूठी वक्तव्य कला से लन्दनवासी सिहर उठे |

1925 में कानपुर अधिवेशन के लिए वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयी | वे इस पद पर प्रथम भारतीय महिला थी | इससे पूर्व श्रीमती एनीबीसेंट अध्यक्ष थी | श्रीमती सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) मानती थी कि “स्वतंत्रता संग्राम में निराशा एक बड़ा अपराध है ” 1926 ने पुन: कांग्रेस अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुयी | 1928 में अमरीका का दौरा करके उन्होंने महात्मा गांधी के संदेश को वहा प्रचारित किया | अमेरिका से लौटकर 1930 में वे गांधीजी के नमक सत्याग्रह में सम्मिलित हुयी तथा 23 मई 1930 को गांधीजी के साथ उन्हें भी जेल भेज दिया गया | 1931 में गोलमेज सम्मेलन में “गांधी इरविन समझौते” में भाग लेने वाले महात्मा गांधी तथा मदनमोहन मालवीय के साथ लन्दन गयी | 1942 में भारत छोड़ो आँदोलन में आगा खा महल में उपवास किया तो श्रीमती सरोजिनी नायडू ने उनकी सेवा में दिन-रात एक कर दिया | बीमारी के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया |

सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रबल पक्षधर थी | उन्होंने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग को मिलाने का बहुत प्रयास किया | मोहम्मद अली जिन्ना के साथ उनके मधुर सम्बन्ध थे | स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्हें उत्तरप्रदेश का राज्यपाल बनाया गया | उत्तर प्रदेश उस समय संयुक्त प्रांत के नाम से जाना जाता था | वे उत्तर प्रदेश की अत्यंत सफल गर्वनर रही | 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरोजिनी नायडू एकदम बदल गयी | उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा | उन्हें उच्च रक्तचाप तथा दमा की बीमारी हो गयी | 02 मार्च 1949 को उनका निधन लखनऊ में हो गया |

इस प्रकार श्रीमती सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) ने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया | भारतीय महिलाओं के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया | शिक्षा ,जागृति , स्वतंत्रता ,मताधिकार , समाधिकार , पर्दा प्रथा , अशिक्षा ,दहेज़ , धार्मिक बंधन आदि के विरुद्ध वे जीवन पर्यन्त लडती रही | श्रीमती सरोजिनी नायडू को भारतीय नारी होने का गर्व था और भारतीय नारी का मस्तक अपने बीच ऐसा नारी रत्न पाकर गर्व से ऊँचा था इसलिए उनकी स्मृति में उनका जन्मदिन “13 फरवरी ” भारत में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है |

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