भक्तकवि सूरदास की जीवनी | Surdas Biography in Hindi

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भक्तकवि सूरदास की जीवनी | Surdas Biography in Hindi
भक्तकवि सूरदास की जीवनी | Surdas Biography in Hindi

भक्तिकाल काव्य की श्रेष्टता की दृष्टि से हिंदी-साहित्य का स्वर्णकाल कहलाता है | इस काल के कवियों में प्रमुख कृष्णभक्त सूरदासजी का नाम स्वर्णअक्षरों में अंकित है | सूरदास जी सगुणमार्गी कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवि है | इनका जन्म संवत 1540 में मथुरा जाने वाली सडक पर स्थित रुनकता गाँव में हुआ था | कुछ विद्वान सूरदास जी का जन्म दिल्ली के निकट सीही गाँव में मानते है |

सूरदास जी बचपन से ही विरक्त हो गये थे और गऊघाट में रहकर विनय के पद गाया करते थे | वल्लभाचार्य ने इनको कृष्ण की लीला का वर्णन करने का सुझाव दिया | ये वल्लभाचार्य के शिष्य बन गये और कृष्ण की लीला का गान करते थे | वल्लभाचार्य ने इनको गोवर्धन पर बने नाथजी के मन्दिर में कीर्तन करने के लिए नियुक्त किया | वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने अष्टछाप के नाम से आठ कृष्ण-भक्त कवियों का संकलन किया | सूरदास अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि है | इनकी मृत्यु पारसोली गाँव में संवत 1640 के लगभग हुयी हटी |

सूरदास के पदों का संकलन सूरसागर नाम में है | सूरसारावली तथा साहित्य-लहरी इनकी अन्य रचनाए है | यह प्रसिद्ध है कि सूरसागर में सवा लाख पद है पर अभी तक केवल दस हजार पद ही प्राप्त हुए है | सूरदास ने कृष्ण की बाल-लीलाओं का बड़ा ही विशद तथा मनोरम वर्णन किया है | बाल-जीवन का कोई पक्ष ऐसा नही , जिस पर इस कवि की दृष्टि न पड़ी हो इसलिए इनका वात्सल्य वर्णन भी बहुत आकर्षक है |

संयोग एवं वियोग दोनों का मर्मस्पर्शी चित्रण सूरदास जी ने किया है | सूरसागर का एक प्रसंग भ्रमरगीत कहलाता है | इस प्रसंग में गोपियों के प्रेमावेश में ज्ञानी उद्धव को भी प्रेमी एवं भक्त बना दिया | सुर के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है इनकी तन्मयता | ये जिस प्रसंग का वर्णन करते है उसमे आत्म-विभोर कर देते है | इनके विरह वर्णन में गोपियों के साथ ब्रज की प्रकृति भी विषाद-मग्न दिखाई देती है

सुर की भक्ति मुख्य रूप से सखा भाव की है परन्तु उसमे विनय , दाम्पत्य और माधुर्य भाव का भी मिश्रण है | सूरदास ने ब्रज के लीलापुरुषोत्तम कृष्ण की लीलाओं का ही विशद वर्णन किया है | सूरदास का सम्पूर्ण काव्य संगीत की राग-रागिनियो में बंधा हुआ पद शैली का गीतकाव्य है | उसमे भाव-साम्य पर आधारित उपमाओं , उत्प्रेक्षाओ और रुपको की छटा देखने को मिलती है | इनकी कविता ब्रजभाषा में है | माधुर्य की प्रधानता के कारण इनकी भाषा बड़ी प्रभावोंत्पाद्क बन गयी है | व्यंग्य वक्रता और वाक्विध्वता सुर की भाषा की प्रमुख विशेषताए है | पद शैली में कृष्ण की लीलाओं के गान की यह परम्परा हिंदी काव्य में आधुनिक काल तक चलती रही |

महाकवि सूरदास ने लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के विविध हृदय-स्पर्शी लीलाओं के द्वारा जन-जीवन को सरस एवं रोचक बनाने का अद्भुत प्रयास किया | कविवर सूरदास की अनुपम विशेषताओं को लक्षित करने में किसी कवि को निम्न पंक्तिया बड़ी ही यथार्थ लगती है |

सुर सुर तुलसी शशि , उडगन केशव दास |
अब के कवि खद्योत सम , जंह जंह करत प्रकाश ||
तत्व-तत्व सुरा कही , तुलसी कही अनूठी |
बची खुची कबिरा कही और कही सब झूठी ||

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